Wednesday, December 21, 2016

नोटबंदी ***विमुद्रीकरण** demonetisation

नोटबंदी पर पेश हैं मेरी ताजा, अस्त-व्यस्त ४ दर्जन पंक्तियाँ।
मन को भाये तो share जरूर करना
नोटबंदी
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५००-१००० की नोट से
जेब था मेरा भारी
बड़े बड़े नोट से
भरी पड़ी अलमारी। १
काली-धोली अलग अलग
बड़ी नोटे थी सारी
नोटबंदी का देखो तमाशा
खरीद भी न पाया चाय और खारी। २
ये नोटबंदी का खेल
सीख दे गया घणी भारी
जहा काम आवे सुई
क्या करे तलवारी। ३
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बैंक में लाग री लंबी कतार
काली कमाई हो गयी तार तार
जो न छुए जिंदगी में अख़बार
पढ़ रहे खबरे बार बार । ४
बैंको की लाइन में खड़े खड़े
हो गया नज़रो में प्यार वार
पुराना धोखेबाज आशिक़ दिखा
खा कर गया वो जुते चार। ५
नकली नोटों की भी तो
बाजार में थी भरमार ,
किराये के दशहत गर्दो पर
भारी पड़ा नोटबंदी का वार। ६
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हैं कही छुपा रखा तो
कर दे सबसे खुली बात,
नहीं तो गर पड़ गया छापा
तो आ जायेगा हृदयाघात। ७
गर ईमान से पैसा जोड़ा ,
आज वो दे मुछो पे ताव
बेईमानी को कालो धन तो
नोटबंदी देगी थाणे घाव। ८
आज चाहता हैं पांचाल
सबको एक बात सिखानी
करके मदद बईमान की
हमे न करनी हैं बईमानी। ९
काले को सफ़ेद करने वो
रकम तेरे खाते में डलवाएगा
लेकिन भोले माणुस तू
जिंदगी भर फस जायेगा। १०
हर नागरिक बनके सिपाही
सब सच्चाई के साथ हैं
भष्ट्राचार के ख़िलाफ़
ये लड़ाई कुछ खास हैं। ११
इतना कुछ सहा हैं तो
थोड़ा और सहना हैं
आखिर हमे स्वप्निल भविष्य के
बीजो को भी तो बोना हैं। १२
-भावनेश पंचाल


उरी आतंकी हमला



 

तुम

लफ्जों की दरकार किसे
मेरी खामोशी ही काफी है ,
तुमसे बात करने को
है गुप अंधेरा चारों ओर दूर तलक,
बंद आंखें ही काफी है तेरा चेहरा देखने को,
दूर हो या पास तु मेरे,
तेरा साथ हो या ना,
यादें काफी है तेरा एहसास करने को
बारिश का भीगापन
या सर्दियों की धूप,
यादों के मौसम ही काफी है
तुझे महसूस करने को
मान लिया है तुझे अपना
क्या फर्क है तू माने या ना
तेरा नाम ही काफी है
तमाम उम्र जीने को

पंचाल

Wednesday, January 13, 2016

पतंग

उत्तरायन  की हार्दिक शुभकामनाये

पतंग

खुले गगन में
बढ़ती जाती
प्रकाश की ओर
छुने  को
नित नयी ऊचाईंया
डर नहीं उसे
ऊचाँइयो का
अपितु हैं भरोसा
स्वयं पर
मंझिल तक पहुचने का।
वाकिफ हैं
राह के संकटो से
सहने होंगे
धपेडे पवन के
तत्पर प्रतिस्पर्धी
काटने को डोर
फिर भी
ठहरी न रहेगी
अपनी तिरछी चाल से
तोड़ती चक्रव्यूह
विरोधियों के
बढ़ती जाती
मंजिल की ओर
सहती रहेगी
झोंको   को
जब तक शांत न हो जाये
झोंके  हवा के
फिर बढ़ चलेगी
रुख देख हवा का
खुद को मोड़ देगी
इस तरह की
प्रतिकूल भी बन जाये अनुकूल
यही काबिलियत हैं पतंग की
करती प्रेरित पांचाल को।
उड़ते तो कागज़ के टुकड़े भी हैं
हवा के साथ-साथ
क्षण पश्चात नहीं रहता अस्तित्व उनका
लेकिन ये पतंग हैं
हैं हुनर इसमें
हवा की चीरने का
बढ़ती रहेगी
उड़ती रहेगी। .......
सदा 

Tuesday, September 15, 2015

अब्दुल कलाम

शब्द सुमन से मेरे आदर्श, अब्दुल कलाम  को श्रृद्धांजलि , स्वरचित कविता आपके चरणो में समर्पित ,

 ये चित्र मैने अपनी अभियांत्रिकी के दिनों में बनाया था ये भी समर्पित..
 
.. 


महान विचारक स्वप्न दृष्टा , मिसाइल मैन की सीख,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत I

स्वप्न नहीं वो जो नींद में दिखते हैं,
अपितु स्वप्न वहीं जो रखे सतत जागृत ,
किया सही अर्थों में स्वप्न को परिभाषित I
आपने ही दी सपनें देखने की सीख,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 1 II

चाहते हो अगर सूरज की तरह चमकना ,
कठिन तप स्वयं को होगा जलना I
पथ प्रशस्त कर सबको साथ ले चलना ,
आप से ही सीखी नेतृत्व की सीख I
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 2 II

पा कर पहली जीत ना कर आराम,
अगर दुसरी बार जो मिल गयी हार,
पहली जीत को कहेंगे लोग, किस्मत का उपहार I
तुमसे ही सीखी निरंतर चलने की सीख,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 3 II

मूसलाधार मेघ बरसे , कड़के भी गर बिजली
बन बाज उड़ चल, बादलो से ऊपरी
हो उड़ान हौसलों से तो मुसीबतें भी पिछड़ी I
कठिन परिस्थिति में भी हौसला रखने की सीख ,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 4 II


स्नेह, मित्रता ,चिंतन ,अध्ययन का ले तु पक्ष,
एक सही पुस्तक हैं सौ मित्र के समकक्ष,
अपितु इक श्रेष्ठ मित्र , समान पुस्तक के कक्ष,
आप ही ने दिये उदहारण मित्रता में हो दक्ष I
युवा-आदर्श, भारत रत्न , युग पुरुष की सीख,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 5 II

इंतजार करने वाला सिर्फ इतना ही हैं पाता,
कोशिश करने वाला जो छोड़ कर हैं जाता I
करता हैं जो प्रयास निरंतर और कष्ट उठाता,
अंततःगत्वा वही स्वर्णिम मंजिल को पाता I
आपने ही दी मजिलो की ओर बढ़ने की सीख,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 6 II

चल पाऊ दिखाये रास्ते पर तेरे
तो धन्य होगा जीवन , कर्म भी मेरे I
लौट आओ फिर से मिटाओ ये अँधेरे,
हटा दो समाज पर लगे बुराइयों के पहरे I
अँधेरे के आग़ोश में इक दीप जलाने की रीत,
बच्चे बच्चे को सिखायी I am Kalam की रीत II 7 II

Friday, January 2, 2015

पूर्णिमा

पूर्ण से प्रेरित हो
पूर्णता लिए ,
आज फिर आया हैं
इस  रात्रि में भी ,
दिखती  मुझे मेरी छाया हैं
सुकून नयन का
प्रकाश पुँज
नभ के मस्तक पर ,
बिन्दिया सा आया हैं
प्रेम प्रतीक, शीतल रात
जीवन में रास लाया हैं।



वो भी चाँद बन
जिंदगी की तन्हा  रात  में
कुछ ऐसे ही आया हैं
रात्रि में प्रकृति ने
मिलन गीत  गाया  हैं

था अधूरा भी , अकेला भी
इस सफर में
वो हमसफ़र बन
खुशिया अपार लाया हैं
पूर्ण से प्रेरित हो
पूर्णता लिए
वो  जिंदगी में आया हैं ।

चांदनी में नहाया पल
थम जा ए समय
ना कभी आये कल
ख़ामोशी की बोलियाँ
स्पर्श का अहसास
शांत रात्रि
साँसो में साँस

सितारों की चुनरी में
चाँद सा चेहरा ख़ास
टूट कर , पिघल कर
खुद  को ,
घुला  पाया हैं
प्यार भरी ओस  में
भीगा पाया हैं
आज पंचाल स्वयं को
पूर्ण पाया हैं
पूर्णिमा से प्रेरित हो
पूर्णता लिए
वो  जिंदगी में आया हैं ।