Wednesday, January 13, 2016

पतंग

उत्तरायन  की हार्दिक शुभकामनाये

पतंग

खुले गगन में
बढ़ती जाती
प्रकाश की ओर
छुने  को
नित नयी ऊचाईंया
डर नहीं उसे
ऊचाँइयो का
अपितु हैं भरोसा
स्वयं पर
मंझिल तक पहुचने का।
वाकिफ हैं
राह के संकटो से
सहने होंगे
धपेडे पवन के
तत्पर प्रतिस्पर्धी
काटने को डोर
फिर भी
ठहरी न रहेगी
अपनी तिरछी चाल से
तोड़ती चक्रव्यूह
विरोधियों के
बढ़ती जाती
मंजिल की ओर
सहती रहेगी
झोंको   को
जब तक शांत न हो जाये
झोंके  हवा के
फिर बढ़ चलेगी
रुख देख हवा का
खुद को मोड़ देगी
इस तरह की
प्रतिकूल भी बन जाये अनुकूल
यही काबिलियत हैं पतंग की
करती प्रेरित पांचाल को।
उड़ते तो कागज़ के टुकड़े भी हैं
हवा के साथ-साथ
क्षण पश्चात नहीं रहता अस्तित्व उनका
लेकिन ये पतंग हैं
हैं हुनर इसमें
हवा की चीरने का
बढ़ती रहेगी
उड़ती रहेगी। .......
सदा 

No comments:

Post a Comment