जिंदगी दौड़ रही हैं
बहुत कुछ पाने कि होड़ में ,
कुछ तो छोड़ रही हैं
छोड़ा था गाँव मैंने भी
पकड़ी थी राह शहर की
बहुत कुछ पाया यहाँ मैंने
लेकिन क्या कुछ नहीं खोया यहाँ मैंने ????
वो गाँव कि हमदर्दी ,
वो चौपाले ,
वो स्नेह ,
वो लंगोटिया यार ,
वो पहला प्यार ,
वो गाँव की बूढी दादी ,
वो सुहानी वादी ,
वो आमो की चोरी ,
फिर भी सीना जोरी,
वो गाँव के मेले ,
वो खिलौनो के ठेले,
वो खेतो में धान कि फली
वो सरसो की कली
वो चाट पकोड़ों कि थड़ी
यारो कि धमाचौकड़ी
वो दादी कि डॉट
इमली वाले खेत कि ,
वो पुराणी बाँट
इसी गाँव में
बिताया बचपन यही
कहते हैं बहुत कुछ पाया मैंने शहर में ,
तुझे ना भूल पाया मेरे गाँव ,
हर शाम, हर सहर में ..
क्या नहीं खोया मैंने इसे पाने में
वो गाँव की जिंदगी
सोचता हैं पंचाल
लौट आये गाव के आँचल
अपितु
कल-कल करते शहर में
छोड़ देता हैं
विचार कल पर ...
....भावनेश
बहुत कुछ पाने कि होड़ में ,
कुछ तो छोड़ रही हैं
छोड़ा था गाँव मैंने भी
पकड़ी थी राह शहर की
बहुत कुछ पाया यहाँ मैंने
लेकिन क्या कुछ नहीं खोया यहाँ मैंने ????
वो गाँव कि हमदर्दी ,
वो चौपाले ,
वो स्नेह ,
वो लंगोटिया यार ,
वो पहला प्यार ,
वो गाँव की बूढी दादी ,
वो सुहानी वादी ,
वो आमो की चोरी ,
फिर भी सीना जोरी,
वो गाँव के मेले ,
वो खिलौनो के ठेले,
वो खेतो में धान कि फली
वो सरसो की कली
वो चाट पकोड़ों कि थड़ी
यारो कि धमाचौकड़ी
वो दादी कि डॉट
इमली वाले खेत कि ,
वो पुराणी बाँट
इसी गाँव में
बिताया बचपन यही
कहते हैं बहुत कुछ पाया मैंने शहर में ,
तुझे ना भूल पाया मेरे गाँव ,
हर शाम, हर सहर में ..
क्या नहीं खोया मैंने इसे पाने में
वो गाँव की जिंदगी
सोचता हैं पंचाल
लौट आये गाव के आँचल
अपितु
कल-कल करते शहर में
छोड़ देता हैं
विचार कल पर ...
....भावनेश
No comments:
Post a Comment