हूँ मैं
इक कृति तू
हैं कृतिकार
पला तेरे गर्भ
में तूने दिया
आकार
तभी अस्तित्व हुआ मेरा
साकार
पीड़ा सही तूने
कितनी अपार
हुआ मेरा जन्म
हुई इक चीत्कार
इस जहाँ में
आने की वो
थी पुकार
पा ली जगह
अंक में तेरे
लुटाया तूने प्रेम
अपार
हैं ख्वाहिश लु जन्म
बन के बेटा
तेरा बार - बार
माँ तुझे
प्रणाम बारम्बार -२ ॥
1 ॥
तेरी छत्र छाया
में बचपन आनंद
विहार
ऊँगली थाम के
तेरी हुआ मैं
चलने को
तैयार
गिरा संभला
फिर गिरा , थामा
तूने ही हर
बार
जब भी कुछ
करने की कोशिश
में, जाता था
मैं हार
तेरा चेहरा देख के
आता था फिर
से जीत का
विचार
तुझसे प्रेरित हो किया
मैंने मंझिलो पे
अधिकार
तूने ही सिखलाया
माँ त्याग-पूर्ण
व्यवहार
इस ममत्व से
ही जहाँ में
हैं ख़ुशी की
बयार
माँ तुझे
प्रणाम बारम्बार -२ ॥
2 ॥
बचपन तो बीत गया
थोडा मैं बड़ा
हुआ
जीवन के तूफाँ
में तेरे ही
दम पे खड़ा
हुआ
भागती जिंदगी चिंता की
हैं लकीरे
बस तेरी बाँहो
में हैं
सुकून मिले
भूल जाऊ सारे
गम मैं इस
जहाँ के
एक बार माँ
बस गले से
लगा ले
तू हैं मेरी
खुशी, हँसी, मुस्कान
और आन
माँ देखना एक दिन
मैं बढ़ाऊंगा तेरी
शान
हूँ मैं
प्रतिबिम्ब तेरा तू
ही हैं स्त्रोत मेरा
तेरे ही दम
से लगाऊंगा इस
कश्ती को पार
माँ तुझे
प्रणाम बारम्बार -२ ॥
3 ॥

No comments:
Post a Comment